भूख अब वर्षांत

व्यापार और अर्थव्यवस्था के क्षेत्रों में काफी साल बिताने के बाद, चार साल पहले, मैंने स्वयं को मानवी निर्बलता की सीमाओं पर काम करते हुए देखा. और मैं उन जगहों पर गई जहां लोग ज़िंदा रहने के लिए लड़ रहे हैं , पर उन्हें एक वक्त का भोजन भी नहीं मिल रहा है. यह लाल प्याला रवांडा से है और फेबियन नामक एक बालक का है. और मैं इसे हर जगह ले आती हूँ एक प्रतीक के रूप में, सचमुच, हमारी इस चुनौती का और उम्मीद का भी. क्योंकि दिन में एक प्यालाभर खाना फेबियन की ज़िन्दगी को पूरी तरह बदल देता है. पर मैं आज जो बात करना चाहूंगी, वह इस हकीकत के बारे में है, कि इस सुबह, पृथ्वी पर एक अरब लोग – या हर सात लोगों में से एक – यह जाने बिना नींद से जागे हैं कि इस प्याले को कैसे भरा जाए. हर सात व्यक्तियों में से एक.

पहले, मैं आपसे पूछूंगी, आपको इस बात की परवाह क्यों होनी चाहिए? हम इस बात की परवाह क्यों करें? ज़्यादातर लोगों को, जब वे भूख के बारे में सोचते हैं, अपने ही पारिवारिक इतिहास में ज़्यादा दूर मुड़कर नहीं देखना पडेगा – शायद उन्ही के जीवनकाल में या उनके माँ-बाप या दादा-दादियों के जीवनकाल में – भूख के किसी अनुभव को याद करने के लिए. बहुत ही असामान्य तौर पर ही मुझे ऐसे श्रोतागण मिलते हैं जिनके अतीत में भूख के अनुभव देखने के लिए और पीछे ढूंढना पड़ता है. कुछ लोग शायद यह मानते हैं कि भूखों की ओर हमदर्दी से पेश आना इंसानियत का एक बुनियादी फ़र्ज़ गिना जाना चाहिए. जैसे गांधीजी ने कहा, “भूखे इंसान की नज़र में रोटी का टुकड़ा ईश्वर का चेहरा है.” अन्य लोग चिंतित हैं विश्व की शान्ति, सुरक्षा और स्थिरता के विषय में. हमने देखा है 2008 के दंगों को जो खाने के अभाव से हुए, जब मेरे शब्दों में, भूख के एक खामोश बाढ़ ने दुनिया को लपेट लिया था, जब रातों रात खाद्य-पदार्थों के दाम दुगुने हो गए थे. भूख का अस्थिरताजनक प्रभाव मानवी इतिहास के दौरान भली-भाँति जाना गया है. सभ्यता के मूलभूत कर्तव्यों में से एक है यह सुनिश्चित करना, कि लोगों को पर्याप्त भोजन प्राप्त हो.

अन्य लोग माल्थस द्वारा बताई गयी भयानक संभावनाओं को लेकर चिंतित हैं. क्या हम खिला पाएंगे ऐसी आबादी को जो मात्र कुछ ही दशकों में नौ अरब तक जा पहुंचेगी ? भूख नाम की चीज़ के साथ समझौता मुमकिन नहीं है. लोगों को भोजन तो चाहिए ही. और लोगों की संख्या कुछ ज़्यादा ही होनेवाली है. इसका एक मतलब यह है कि इससे ऊंचे और निचले स्तर दोनों में काफी नौकरियां और मौके पैदा होते हैं. मगर वास्तव में मैं इस समस्या की ओर एक अलग रस्ते से पहुँची. यह मेरी और मेरे तीन बच्चों की तस्वीर है. सन 1987 में मैं पहली बार मां बनी. मेरा पहला बच्चा हुआ, और मैं उस को दूध पिला रही थी, जब इससे बहुत मिलता-झुलता एक चित्र दूरदर्शन पर प्रसारित हुआ. इथिओपिया फिर एक बार सूखे से ग्रस्त था. इससे दो साल पहलेवाले सूखे से दस लाख से अधिक लोग मरे थे. मगर मैं इस चीज़ से कभी इस तरह प्रभावित नहीं हुई जैसे मैं उस पल में हुई क्योंकि उस चित्र में एक महिला थी जो अपने बच्चे को दूध पिलाने की कोशिश में थी, और उसके पास पिलाने के लिए दूध नहीं था. एक माँ के तौर पर , उस बच्चे के रोने की आवाज़ ने मुझे भीतर तक आहत कर दिया. और मैंने सोचा, कि मन पर टिकनेवाली और गहरी वेदना नहीं हो सकती, जैसे एक बच्चे के रोने की है, जिसका जवाब खाने से नहीं दिया जा सकता – खाना, जो हर इंसान की बुनियादी उम्मीद है. और उसी क्षण में मैं भर गयी विरोध और उत्तेजना की भावना से इस बात पर, कि हम इस समस्या का समाधान वास्तव में अब ही जानते हैं.

यह कोई अजीब बीमारी नहीं है जिसका इलाज हमारे पास नहीं है. हम भूख का इलाज जानते हैं. सौ साल पहले हम यह नहीं जानते थे. अब वाकई हमारे पास ज़रूरी प्रौद्योगिकी और व्यवस्थाएं मौजूद हैं. और मैं इस बात से चकित हुई कि यह कितना अनुचित है. हमारे इतिहास के इस दौर में यह चित्र अनुचित हैं. खैर आपका क्या अनुमान है? यह पिछले हफ्ते की बात है उत्तरी केन्या से. फिर एक बार, विशाल स्तर पर भुखमरी का चेहरा दिखाई दे रहा है जिसके कारण नब्बे लाख लोग इस सवाल से जूझ रहे हैं कि क्या वे कल तक जीवित रह पाएंगे. असल में, हम अब यह बात जानते ही हैं कि हर दस सेकण्ड में हम भुखमरी के कारण एक बच्चे को खोते हैं. यह HIV एड्स , मलेरिया और ट्यूबरकुलोसिस की मौतों की कुल गिनती से अधिक है. और हम जानते हैं कि समस्या केवल भोजन के उत्पादन का नहीं है.

मेरे जीवन के मार्गदर्शकों में से एक हैं नार्मन बोर्लोग , जिन्हें मैं महापुरुष मानती हूँ. मगर आज मैं बात करनेवाली हूँ भोजन पाने की क्षमता के विषय में, क्योंकि वाकई इस साल और पिछले साल और 2008 की संकटमय खाद्य परिस्थिति में भी, पृथ्वी पर पर्याप्त भोजन उपलब्ध था सबको 2700 किलोकैलोरी मिलती थी. तब क्यों अब एक अरब लोग हैं जो भोजन पाने में असमर्थ हैं? और मैं एक और विषय पर चर्चा करना चाहूंगी, जिसे मैं ‘नई जानकारी का बोझ’ कहती हूँ. सन 2008 में लैंसेट पत्रिका ने सारे संशोधन का संकलन कर यह ठोस सबूत पेश किया कि अगर किसी बच्चे को अपने पहले हज़ार दिनों में – गर्भाधान से लेकर दो साल की उम्र तक – पर्याप्त पोषण प्राप्त नहीं है, तो इसका दुष्परिणाम बेइलाज है. उनके मस्तिष्क और शरीर का विकास बाधित रह जाता है. और यहाँ आप देख रहे हैं दो बच्चों के मस्तिष्क के छान-बीन का छायाचित्र – एक का, जिसे पर्याप्त पोषण प्राप्त था, और एक अलग बच्चे का, जो बुरी तरह कुपोषित था. और यह दिखाई देता है कि ऐसे बच्चों के दिमाग का आकार सामान्य बच्चों से 40 प्रतिशत तक कम है. और इस पृष्ठ पर आप देख रहे हैं कि दिमाग के न्यूरॉन और उनके जोड़ निर्मित नहीं होते. और अब हम जो एक चीज़ जानते हैं वह यह है कि इसका हमारी अर्थव्यवस्थाओं पर गहरा असर पड़ता है, जिसकी बात मैं बाद में करूंगी. मगर एक और बात यह है कि इन बच्चों की कमाने की क्षमता कटकर आधी रह जाती है उनके जिंदगीभर, छोटी उम्र में कुपोषण द्वारा दबोच लिए जाने के कारण.

तो मैं इसी जानकारी के बोझ से प्रेरित हूँ. क्योंकि वाकई हम इसका सरल इलाज जानते हैं. और इसके बावजूद, कई जगहों में, एक तिहाई बच्चों को, तीन साल की उम्र तक पहुंचने पर ही, इसी वजह से जीवन में कठिनाइयां झेलनी पड़ती है. मैं बात करना चाहूंगी कुछ चीज़ों के बारे में जिन्हें मैंने देखा हैं भूख के खिलाफ जंग के मोर्चों में, कुछ चीज़ें जो मैंने सीखी हैं, मेरे व्यापारिक तथा अर्थशास्त्रीय ज्ञान और निजी क्षेत्र के अनुभव को इस क्षेत्र में लाकर. मैं बताना चाहूंगी कि इस जानकारी में अवरोध कहाँ है.

खैर सबसे पहले मैं पृथ्वी पर पोषण की सबसे पुरानी प्रक्रिया के विषय में बात करना चाहूंगी, जो है, स्तनपान. आपको यह जानकार आश्चर्य होगा कि हर 22 सेकण्ड में एक बच्चे को बचाया जा सकता है, अगर सभी को जीवन के पहले छह महीनों में स्तनपान मिल पाए. मगर नाइजर में, मिसाल के तौर पर, सात प्रतिशत से भी कम बच्चे जीवन के पहले छह महीनों में केवल और केवल स्तनपान ही पाते हैं. मौरितानिया में यह संख्या तीन प्रतिशत से भी कम है. इन हालातों में जानकारी से बदलाव लाया जा सकता है. इस सूचना, इस वार्ता, को हम प्रसारित कर सकते हैं कि यह मात्र बीते कल के जीने का ढंग नहीं, बल्कि आपके बच्चे की जान बचाने का उत्तम उपाय है. और आज हम ध्यान देते हैं न केवल भोजन का वितरण करने में, बल्कि यह निश्चित करने में कि माएँ पर्याप्त पोषण पा रही हैं और उन्हें स्तनपान के विषय में जानकारी प्राप्त है.

दूसरी एक चीज़ है जिसके बारे में मैं बात करना चाहूंगी – अगर आप दूर-दराज़ के किसी गाँव में रहते हों, अगर आपके बच्चे को विकलांगता हो, अगर आपके क्षेत्र में सूखा हो या बाढ़ हो, और अगर आप ऐसी स्तिथि में हों जहां भोजन पदार्थों में विविधता का अभाव है, तो आप क्या करेंगे ? क्या आप सोचते हैं कि आप किसी दूकान में जाकर आपके पसंदीदा ‘पॉवर बार’ खरीद सकते हैं, जैसे हम यहाँ कर सकते हैं, और आपकी ज़रूरतों से मिलता-जुलता सही माल चुन सकते हैं ? मुझे नज़र आते हैं भुखमरी की रणभूमि में जूझ रहे माँ-बाप, जो यह जानते हैं कि इस लड़ाई में उनके बच्चे हार का सामना कर रहे हैं. और मैं जाती हूँ उन दुकानों में, अगर वे हों तो, या बाहर खेतों में, यह देखने कि उन्हें क्या मिल सकता है, और उन्हें पौष्टिकता उपलब्ध नहीं हैं. अगर उन्हें पता भी हो कि उन्हें करना क्या है, यह पदार्थ उन्हें उपलब्ध नहीं हैं.

और मुझे उत्साह है इस बात का, क्योंकि एक काम जिसमें हम लगे हुए हैं, वह है भोजन उद्योग क्षेत्र में उपलब्ध प्रौद्योगिकी का परिवर्तन, ताकि यह पारंपरिक फसलों के लिए भी उपलब्ध हों. यह बना है चना, निर्जल दूध और कई विटामिन के मिश्रण से, जो मस्तिष्क की आवश्यकताओं से पूरा मिलता है. और इसके उत्पादन में हमारे सिर्फ 17 सेंट खर्च होते हैं, यह बनाने में, जिसे मैं ‘मानवता का अन्न’ कहती हूँ | हमने यह किया भारत और पाकिस्तान के भोजन-वैज्ञानिकों के साथ – सचमुच बस तीन लोगों के ज़रिये. मगर इससे परिवर्तन हो रहा है 99 प्रतिशत बच्चों में, जो इसे पा रहे हैं. एक पैकेट, रोज़ 17 सेंट के दाम में, और उनके कुपोषण का निवारण हो जाता है. तो मैं निश्चित हूँ कि अगर समृद्ध विश्व में आम तौर पर पाई जानेवाली प्रौद्योगिकी का पूरा उदघाटन और विस्तार किया जाए, तो एक खाद्य-क्रान्ति संभव है. और यह किसी मौसम में नहीं बिगड़ता. इसे प्रशीतक की आवश्यकता नहीं है, न जल की, जिसका अक्सर अभाव है. और इस प्रकार की प्रौद्योगिकी में, मैं मानती हूँ, यह क्षमता है पूरी तरह चेहरा ही बदल देने की, भूख, कुपोषण और पोषण का, वहीं जहां इनके खिलाफ जंग जारी है.

अगली चीज़ जिसके बारे में मैं बात करना चाहूंगी, वह है शालेय भोजन. दुनिया के 80 प्रतिशत लोगों के लिए भुखमरी से बचानेवाला कोइ सुरक्षा जाल नहीं है. किसी भी विपत्ति के समय – जब अर्थव्यवस्था बर्बाद है, जब लोग नौकरी खो बैठते हैं , बाढ़, जंग, तनाव , कुशासन , जैसी स्तिथियों में – उन्हें सहारा लेने का कोई ठिकाना नहीं है. और आम तौर पर संस्थाएं – गिरजे, मंदिर इत्यादि – उस सामग्री से संपन्न नहीं हैं जिससे वे सुरक्षा जाल प्रदान कर पाएंगे. विश्व बैंक के साथ काम करते समय हमें यह पता लगा है कि गरीब इंसान के लिए सुरक्षा जाल, और सबसे बेहतर निवेश, है शालाओं में भोजन की व्यवस्था. और अगर आप इस प्याले को लघु कृषकों के स्थानीय उत्पाद से भरें, तो इसका परिणाम परिवर्तनशील होगा. दुनिया में ऐसे बहुत सारे बच्चे हैं जो स्कूल नहीं जा पाते क्योंकि उन्हें एक वक्त के खाने के लिए भी भीख मांगनी पड़ती है. मगर जब यह खाना मौजूद है, तो इससे बदलाव आता है. 25 सेंट से भी कम खर्च होता है, एक बच्चे के जीवन में परिवर्तन लाने के लिए.

मगर सबसे कमाल की बात है लड़कियों पर असर. उन देशों में जहां लडकियां स्कूल नहीं जातीं, अगर वहां स्कूल में एक वक्त का खाना दिया जाता है, तो आप देखेंगे कि भरती की संख्या में 50 प्रतिशत लडकियां और लड़के हैं. लड़कियों की हाज़िरी में भी बदलाव नज़र आता है | और यह ज़रा भी बहस की बात नहीं है, क्योंकि यह फायदे की बात है. परिवारों को मदद की ज़रुरत है. और हम यह देखते हैं कि अगर हम लड़कियों को ज़्यादा दिन स्कूल में रखें , वे 16 साल की उम्र तक स्कूल में पढ़ेंगी, और जब स्कूल में भोजन हो, वे शादी करने के लिए मजबूर नहीं होंगी. अगर हफ्ते के आखिर में उन्हें भोजन का अधिक हिस्सा दिया जाए -जिसका खर्च 50 सेंट के आस-पास होगा – तो लडकियां स्कूल में पढाई जारी रखेंगी, और एक अधिक स्वस्थ बच्चे को जन्म देंगी, क्योंकि कुपोषण का सिलसिला पीढ़ी-दर-पीढ़ी जारी रहता है.

हम जानते हैं कि भूख के मामले में भरमार और अभाव के सिलसिले जारी हैं. हम यह जानते हैं. इसी वक्त उत्तरपूर्वी अफ्रीका में, और इससे पहले भी, हम इसका अनुभव कर चुके हैं. तो क्या यह अभियान पूरी तरह नाउम्मीद है ? हरगिज़ नहीं. मैं बात करना चाहूंगी, उनके बारे में, जिन्हें मैं ‘आशा के भण्डार’ कहती हूँ. कैमेरून, उत्तरी कैमेरून में भूख के भरमार और अभाव के सिलसिले जारी हैं, प्रतिवर्ष कई दशकों के लिए. भोजन की सहायता प्रतिवर्ष आ पहुँचती है जब लोग सूखे मौसम में भूखे हैं. दो साल पहले, हमनें निर्णय लिया कि हम भुखमरी के विरुद्ध हमारी रणनीति बदल देंगे, और खाद्य सहायता का दान करने के बजाय हम इसे भोजन बैंक में जमा करेंगे. और हमने कहा, सुनिए, सूखे मौसम में इस भोजन को बाहर निकालिए. इन्हें आप ही संभालिये ; गाँव के स्तर पर ही इन भंडारों का संचालन होता है. और फसल काटने के समय, उसे भण्डार को लौटाइए, मुनाफे के साथ, खाद्य मुनाफा सहित. वहां जमा कीजिए प्रतिशत अधिक, या 10 प्रतिशत अधिक अनाज. पिछले दो सालों में ऐसे 500 गाँव हैं , जिन्हें खाद्य सहायता की आवश्यकता नहीं रही है – अब वे स्वावलंबी हैं. और भोजन के भण्डार भी बढ़ रहे हैं. और गाँव के वासियों द्वारा शालाओं में भोजन के कार्यक्रम का भी आरम्भ हो रहा है. मगर इनके पास अब तक मूलभूत व्यवस्थाएं और संसाधन निर्माण करने की क्षमता नहीं थी. मुझे यह सुझाव अतिप्रिय है क्योंकि यह ग्रामीय स्तर से आया – भण्डार खोलने के लिए तीन चाबियाँ. यहाँ खाना ही सोना है. और ऐसे सरल सुझाव चेहरा ही बदल सकते हैं , सिर्फ छोटे इलाकों के नहीं, बल्कि दुनियाभर के बड़े इलाकों के.

मैं बात करना चाहूंगी उसके बारे में, जिसे मैं ‘डिजिटल फ़ूड’ (अंकीय भोजन ) कहती हूँ. प्रौद्योगिकी द्वारा खाद्य असुरक्षितता का चेहरा ही बदल रहा है, उन इलाकों में जो ऐतिहासिक तौर पर सूखे से ग्रस्त हैं. अमर्त्य सेन ने नोबेल पुरस्कार यह कहकर जीता कि, “बात यह है कि भोजन के मौजूद होने पर भी भुखमरी हो सकती है, क्योंकि लोगों के पास उसे खरीदने का सामर्थ्य नहीं है.” बेशक हमनें 2008 में यही देखा. हम अब यही देख रहे हैं उत्तरपूर्वी अफ्रीका में जहां खाद्य पदार्थों के दाम पिछले साल में 240 प्रतिशत बढ़ गए हैं. खाना शायद हो भी, मगर लोग खरीद नहीं पा रहे हैं.

खैर यह तस्वीर – मैं हेब्रोन में थी एक दुकान में, इस दुकान में, जहां भोजन पहुंचाने के बजाय, हम अंकीय भोजन लाते हैं, एक कार्ड के ज़रिये. यह अरबी में कहता है “शुभ आहार!” कोई महिला यहाँ आ सकती हैं और इस कार्ड के ज़रिये नौ तरह के खाद्य सामान खरीद सकती है. यह पौष्टिक होना चाहिए, और स्थानीय उत्पाद से बना हुआ. और हुआ यह, बस पिछले साल में, कि डेरी उद्योग में – जहां इस कार्ड का इस्तेमाल दूध, दही, अंडे और हम्मस (पीसे छोले) के लिए होता है- वहां डेरी उद्योग में 30 प्रतिशत की वृद्धि हुई. दुकानदार ज्यादा लोगों को नौकरी दे रहे हैं. यह सब के लिए फायदे का मामला है, और इससे खाद्य अर्थव्यवस्था की गति भी बढ़ती है. हम खाना पहुंचाते हैं तीस से अधिक देशों में, सेल-फ़ोन के माध्यम से, जिससे इन मुल्कों में मौजूद शरणार्थियों की स्तिथि में भी बदलाव आया है, अन्य कई माध्यमों के साथ ही.

शायद मुझे सबसे ज़्यादा स्फूर्ति दिलानेवाला सुझाव यह है जिसका बिल गेट्स, हावर्ड बफेट और अन्य लोगों ने साहस से समर्थन किया है, यह प्रश्न पूछकर कि – क्यों ना, भूखे लोगों को पीड़ित के रूप में देखने के बजाय – और इनमें ज़्यादातर लोग छोटे किसान हैं जो न पर्याप्त अनाज उगा पाते हैं न उसे बेच पाते हैं अपने ही परिवारों को संभालने के लिए भी – हम क्यों ना इन्हें इस समस्या के समाधान के रूप में देखें, भूख के विरुद्ध युद्ध में जनबल के रूप में ? क्यों ना अफ्रीका की महिलाओं से, जो अनाज बेच नहीं पा रही हैं – यहाँ न सड़क हैं, न भण्डार न अनाज को उठाने के लिए तिरपाल- क्यों ना हम उन्हें ताकद दिलानेवाला एक माहौल पैदा करें जिसमें वे भोजन प्रदान कर सकेंगी अन्य इलाकों के भूखे बच्चों को खिलाने में ? और आज ‘पर्चेसिंग फॉर प्रोग्रेस’ (प्रगति के लिए क्रय ) 21 देशों में चालू है. और इसका नतीजा ? लगभग हर एक के मामले में, जब गरीब किसानों को आश्वासन दिलाया जाता है कि उनके माल के लिए बाज़ार मौजूद है – अगर आप कहेंगे, “हम इस माल के 300 मेट्रिक टन खरीदेंगे. इसका परिवहन हम करेंगे. हम इसका सही तरह से संचय करेंगे.” – तो उनकी उपज दुगुनी, तिगुनी, चौगुनी तक हो जाती है और यह कर दिखाने में वे सफल हो जाते हैं, क्योंकि यही पहली बार है उनके जीवन में, जब उन्हें एक ऐसा भरोसेमंद मौका मिला है. और हम देखते हैं कि लोग अपने जीवन में परिवर्तन ला रहे हैं. आज, खाद्य सहायता, हमारी खाद्य सहायता, – एक महान गतिशील साधन – का 80 प्रतिशत क्रय विकासशील विश्व में होता है. यह संपूर्ण परिवर्तन है जो वास्तविक तौर पर सुधार ला सकता उन्हीं लोगों के जीवन में जिन्हें इस भोजन की आवश्यकता है.

अब शायद आप पूछेंगे, क्या यह और बड़े स्तर पर ऐसा आयोजन संभव है ? यह बढ़िया सुझाव हैं, ग्राम्य स्तर पर. मैं बताना चाहूंगी ब्राज़ील के बारे में, क्योंकि मैंने ब्राज़ील की यात्रा की है पिछले दो सालों में, जब मैंने पढा कि ब्राज़ील भूख पर जीत पा रहा है, इस समय पृथ्वी के किसी भी राष्ट्र से अधिक तेज़ी से. और मैं जान सकी हूँ कि पैसों को खाद्य अनुदान अथवा अन्य चीज़ों में लगाने के बजाय, उन्होंने शालेय भोजन कार्यक्रमों में निवेश किया है. और वे यह लागू करते हैं कि इस भोजन का एक तिहाई भाग उन छोटे किसानों से आए, जिन्हें अब तक मौक़ा ही न मिला हो. और वे यह कर रहे हैं विशाल स्तर पर, जबसे राष्ट्रपति लूला ने अपने इस लक्ष्य की घोषणा की, कि सबको तीन वक्त का खाना मिलना ही होना चाहिए. और यह शून्य भूख योजना का खर्च, कुल देशी उत्पाद के आधे प्रतिशत से कम है और इससे कई लाखों लोगों का भूख और गरीबी से उद्धार हुआ है. इससे ब्राज़ील में भूख का चेहरा बदल रहा है, यह विशाल स्तर पर हो रहा है, और यह नए मौके पैदा कर रहा है. मैं वहां गयी हूँ, और मेरी मुलाक़ात हुई है उन छोटे किसानों से जिन्होंने अपना रोज़गार निर्माण किया है, इसके द्वारा मिले अवसर और आधार पर.

अब अगर हम इस विषय की आर्थिक अनिवार्यता पर नज़र डालें, तो यह केवल करुणा का विषय नहीं है. हकीकत यह है, कि संशोधन द्वारा पता लगा है, कि भूख और कुपोषण से होनेवाला नुक्सान – जिसकी कीमत समाज को चुकानी पड़ती है, जिस बोझ को संभालना पड़ता है – प्रतिवर्ष के कुल देशीय उत्पाद का औसतन छह प्रतिशत है, और कुछ देशों में 11 प्रतिशत तक है. और अगर आप नज़र डालेंगे उन 36 देशों पर जो कुपोषण का सबसे भारी बोझ उठा रहे हैं, तो कुल मिलाकर 260 अरब का नुक्सान होता है उपजाऊ अर्थव्यवस्था से, हर साल. खैर, विश्व बैंक का अनुमान है कि 10 अरब डालर 10.3 — लगेंगे इन देशों में कुपोषण को निबटाने में. आप ज़रा इसके फायदे और नुक्सान का हिसाब कीजिए, और मैं सपना देखती हूँ इस मुद्दे को प्रस्तुत करने का, केवल दया के वाद द्वारा नहीं, बल्कि विश्व के वित्त मंत्रियों के सामने रखने, और यह कहने, कि सम्पूर्ण मानव-जाति को पर्याप्त और अल्प-लागत भोजन दिलाने के लिए निवेश करने से इनकार करना, यह हमारे लिए असहनीय है.

एक गज़ब की बात जो मैंने जानी है, वह यह है, कि विशाल स्तर पर कुछ नहीं बदल सकता एक नेता के दृढ़ निश्चय के बिना. जब कोई नेता कहते हैं, “मेरे होते हुए हरगिज़ नहीं!”, तो सब कुछ बदलने लगता है | और अब दुनियाभर के लोग आ सकते हैं यहाँ साधक वातावरण और अवसर निर्माण करने. और यह बात कि फ्रांस ने G20 में भोजन को केन्द्रीय स्थान दिया है, सचमुच अहम है. क्योंकि भोजन की समस्या का समाधान व्यक्तिगत तौर पर या राष्ट्रीय तौर पर भी नहीं पाया जा सकता. हमें एकजुट होकर खड़ा होना होगा. हम देख रहे हैं अफ्रीका के कुछ देशों को. 30 देशों से विश्व खाद्य कार्यक्रम (WFP) अब बाहर निकल पाया है क्योंकि इन देश के वासियों ने वहां भूख का चेहरा बदल दिया है.

मैं यहाँ आपके सामने पेश करना चाहूंगी एक चुनौती. मैं मानती हूँ कि हम मानवी इतिहास के ऐसे समय में जी रहे हैं, जब हमें ऐसी स्तिथि बिलकुल मान्य नहीं है, जिसमें बच्चे जागते हैं और यह नहीं जानते कि प्यालाभर खाना कहाँ मिलेगा. बस वही नहीं, पर भूख की स्तिथि में परिवर्तन लाने का अवसर मौजूद है, मगर हमें हमारी मनोवृत्ति बदलनी होगी | मैं खुद को सम्मानित समझती हूँ, यहाँ विश्व के श्रेष्ठ आविश्कारियों और विचारकों के बीच आकर. और मैं आपसे आग्रह करना चाहूंगी कि आप भी शामिल होइए पूरी मानवजाति के साथ यह रेखा खीचने और कहने में, कि, ” अब और नहीं. इससे आगे हम यह नहीं बर्दाश करेंगे.” और हमें बताना है हमारे बच्चों के बच्चों को, कि इतिहास में ऐसा एक भयानक समय था जब एक तिहाई तक के बच्चों के मस्तिष्क और शरीर कुपोषण से दबोचे जाते थे, मगर ऐसे हालात के अब नाम औ निशाँ नहीं रहे |

by josette शीरन/ TEd Video : http://www.ted.com/talks/lang/en/josette_sheeran_ending_hunger_now.html

 

 

©2012 ALL RIGHTS RESERVED THE AUTHOR(S) AND THE PUBLISHER

—————————————————————————————————————————–

Dear Readers

We invite you to visit our internet magazines and stream TV

About geopolitics and geofinance. Prosumerzen www.prosumerzen.net

About the trends between states and non state actors : WestphaliaXXI www.westphaliaxxi.com

About spiritual and material sustainable life style : Spiriterial www.spiriterial.com

About art and culture : Artagorapolis  www.u4art.com

Our Open TV. Not only video but also more than 4.000 releases each day selected inside the top 100 newspapers in the world:  www.info4tv.org

Il Romanzo www.glispeculari.com